Skip to main content

कया कहती है जन्म कुण्डली।

 जन्मकुंडली में आर्थिक लाभ और हानि के कुछ योग

〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰️〰️

यदि आप धनवान बनने का सपना देखते हैं, तो आप अपनी जन्म कुण्डली में इन ग्रह योगों को देखकर उसी अनुसार अपने प्रयासों को गति दें।


1👉  यदि लग्र का स्वामी दसवें भाव में आ जाता है तब जातक अपने माता-पिता से भी अधिक धनी होता है।


2👉  मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है।


3👉  जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है।


4👉 शनि ग्रह को छोड़कर जब दूसरे और नवे भाव के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठे होते हैं तब व्यक्ति को धनवान बना देते हैं।


5👉 जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बना देते हैं।


6👉 दूसरे भाव का स्वामी यदि 8 वें भाव में चला जाए तो व्यक्ति को स्वयं के परिश्रम और प्रयासों से धन पाता है।


7👉 यदि दसवें भाव का स्वामी लग्र में आ जाए तो जातक धनवान होता है।


8👉 सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होने पर व्यक्ति अपार धन पाता है। विशेषकर जब सूर्य और राहू के ग्रहयोग बने।


9👉 छठे, आठवे और बारहवें भाव के स्वामी यदि छठे, आठवे, बारहवें या ग्यारहवे भाव में चले जाए तो व्यक्ति को अचानक धनपति बन जाता है।


10👉 यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति खेल, जुंए, दलाली या वकालात आदि के द्वारा धन पाता है।


11👉 मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से, खेती से या भवन से आय प्राप्त होती है, जो निरंतर बढ़ती है।


आर्थिक नुक्सान

〰〰🌼〰〰

1👉  यदि दूसरे भाव में पाप ग्रह शनि,मंगल, राहू, केतू इनमे कोई एक या दो से अधिक ग्रह शत्रु राशी में बैठे हो, अथवा इन ग्रहों की दूसरे भाव पर दृष्टी होतो, संचित धन का नाश कर देते हैं।


2👉 यदि कोई पापी ग्रह शनि, मंगल, सूर्य अष्टम में बैठ कर सप्तम दृष्टी से दूसरे भाव को देखेगे तो धन का नाश करेगी, इसमे शर्त यह है कि दूसरे भाव की राशी इनकी खुद की राशी ना हो।


3👉  यदि 5 वे भाव में स्थित शनि 10 दृष्टी से दूसरे भाव को, मंगल 7 वे भाव से 8 वी दृष्टी से दूसरे भाव को देखता है तो, धन का नाश होगा।


4👉 यदि राहू या केतू 6 ठे भाव में स्थित होकर 9 वी दृष्टी से भाव दूसरे भाव को देखेगे तो धन का नाश कर देंगे।


5👉  यदि दूसरे भाव में सूर्य+शनि अथवा सूर्य+राहू होतो, राज प्रकोप से धन का नाश होता है।


6👉  यदि 11 वे भाव में कोई भी ग्रह सूर्य, चन्द्र, मंगल,बुध, गुरु, शुक्र, शनि होतो, वे जातक को धन लाभ कराते है. 11 वे भाव में स्थित ग्रह जिन वस्तुओं के कारक होते है, उन वस्तुओं के कारोबार से जातक को धन-लाभ होता है।


7👉  राहू, केतू 11 वे भाव में होतो, धन लाभ में रूकावट डालते है। आय में विलम्ब करते है। यह ग्रह अचानक रूका हुआ धन दिला देते है।


8👉 यदि 12 वे भाव में सूर्य+शनि की युति होतो , मुकदमे बाज़ी में धन का नाश होता है।


9👉 यदि दूसरे भाव का स्वामी और 11 वे भाव का स्वामी 12 वे भाव में होतो जातक निर्धन हो जाता है।


10👉  यदि दूसरे भाव का स्वामी 12 वे भाव में होतो, जातक के पास धन नहीं होगा।


11👉  यदि 11 वे भाव का स्वामी 12 वे भाव में होतो, जातक कमाता जायेगा और खर्च होता जायेगा।

〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼

〰〰🌼〰〰🌼〰〰

Scripted by Sandeep Sharma Sandeepddn71@gmail.com Sanatansadvichaar.blogspot.com

 Jai shree Krishna g 👌 🙏 💖 

Comments

Popular posts from this blog

धर्म क्या है? इसका महत्व क्या है।

 उतर:- आजकल  धर्म को लोग  बड़े विचित्र  रूप से देखने लगे हैं।हर किसी ने अपनी सुविधानुसार व बुद्धि अनुसार इसकी अपनी ही व्याख्या गढ़ ली है।जो कि वास्तविक आधार लिए नहीं है। आमतौर पर अपनी आस्था की पद्धति या उसके विभिन्न पहलुओं की व्याख्या करने वाले विद्वान् भी इस सरल से अभ्यास को जटिल ही बनाए जा रहे हैं। यहां आज यह एक अभिव्यक्ति का सशक्त व  संवेदनशील मुद्दा बनाया जा रहा है वहीं यह अपनी वास्तविक आधार खोता जा रहा है। (क्यूंकि इस में काल के अनुसार नवीनता की बहुत गुंजाइश है।)मैं किसी को व्यक्तिगत रूप से दोषी नहीं मानता क्योंकि हर किसी को अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता है वहीं अपनी जानकारी व विवेक के आधार पर अपनी राय रखने का भी अधिकार है। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि धर्म मात्र आस्था विश्वास की अपनाई जाने वाली कोई  पद्धति मात्र नहीं बल्कि विशुद्ध  रूप से न्यायसंगत कर्मों की न्यायिक  व्यवस्था है। अगर मैं इसे  किसी अन्य  रूप से कहूं तो हमारी श्रृद्धा व इमानदारी से किया गया आचरण जो शत-प्रतिशत हमारे कर्त्तव्यों को न्यायपूर्ण ढंग से व जो काल, स्थान...

भौतिक शरीर क्या है? इसका क्या महत्व है!

शरीर के बारे में श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि ये ज्ञान क्षेत्र व श्रेत्रज्ञ का है। यहां क्षेत्र को शरीर कहा है वह इसके जानकार को क्षेत्रज्ञ। अतः पांच भौतिक तत्वों अग्नि,वायु जल,आकाश (जिसे अंतरिक्ष भी कहते हैं) ,व भूमि, से निर्मित ये परिकृषत  स्वचालित व जटिल उपकरण जो आपको मिला है इसके पीछे एक गूढ़ उद्देश्य है।यह मात्र दो अणुओं (अंडाणु व शुक्राणु) के मेल से आरंभ होकर एक उत्कृष्ट यंत्र में विकसित होता है ताकि आपके होने की सार्थकता परिपूर्ण हो।ये इन्हीं पंच  तत्वों से मिलकर बनता है, इन्हीं तत्वों से पोषित होता है वह इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है यह आपके सत्ताशील होने की निशानी है आपके चैतन्य होने का प्रमाण है। और यह तभी सम्भव है जब इसकेे पीछे एक असीम आनन्द का कारण हो। वास्तव में यह जीव का निवास स्थान है यहां से जीवन की समस्त गतिविधियों को पूरा करने का प्रयास जीव करता है। आपके चैतन्य आत्मा जब किसी इच्छा को पूर्ण करने की कामना करता है तो उसे पूरा करने हेतु जो पहली आवश्यकता होती है वो शरीर ही है। यही जीव या प्राणी मात्र के कारण कार्यों को पूरा करने का उपकरण...

मोह क्या है ?

  उ०-किसी भी पदार्थ, वस्तु या संबंध के प्रति अनुराग,व आसक्ति। किसी व्यक्ति विशेष वस्तु विशेष अथवा संबंध विशेष से असीम राग या लगाव हो जाए कि उसके खो जाने मात्र की कल्पना भी भयभीत करदे तो यह स्थिति मोह है। देखा जाए तो यह एक अभिव्यक्ति है जोकि आवश्यक व अनावश्यक दोनों ही है। यदि बात करें आवश्यक की तो यदि इक मां का अपने नवजात शिशु से मोह न हो तो उसका भरनपोषण कैसे संभव होगा। यह उस नियंता की एक व्यवस्था है जिसे समझना होगा । अब इसे अनावश्यक रूप से कब देखें? तो उत्तर में इतना जान ले कि आप किसी वस्तु को अपने अधिकार में ही रखने को ही व्यथित रहे। और अनावश्यक रूप से उसके अन्य कोई सार्थक प्रयोग को बाधित कर रहे हो तो यह मोह अनावश्यक हैं। यहां आपको अनेकों उदाहरण मिलते हैं जो इस शब्द की सार्थकता व निरर्थकता को और विस्तार से जानकारी देता है। कहते हैं श्री राम चरित मानस के रचयिता ,श्री तुलसी दास जी अपनी पत्नी  रत्नावति से बेहद प्रेम रखते थे।एक प्रसंग आता है कि वो अपनी पत्नी से इतना प्रेम रखते थे कि एक बार वो मायके जा रखी थी और तुलसी दास जी को उनका यह वियोग सहा नहीं गया और वो रात्रि में ही उनसे म...