Skip to main content

कथा पौराणिक।

 मृत्यु पर वश नहीं...

〰️〰️🌼〰️〰️

बात है, तेरह सौ वर्ष से भी अधिक पहले की। रत्नों का व्यापार करने वाला एक जौहरी था। व्यवसाय की दृष्टि से वह प्रख्यात रोम नगर में गया और वहाँ के मन्त्री से मिला। मन्त्री ने उसका स्वागत किया। मन्त्री के अनुरोध से जौहरी घोड़े पर सवार होकर भ्रमणार्थ नगर के बाहर गया। कुछ दूर जाने पर सघन वन मिला। वहाँ उसने देखा मणि-मुक्ताओं एवं मूल्यवान् रत्नों से सजा हुआ एक मण्डप है और मण्डप के आगे सुसज्जित सैनिक दल चारों ओर घूमकर प्रदक्षिणा कर रहा है। प्रदक्षिणा के बाद सैनिकदल ने रोमन भाषा में कुछ कहा और वह एक ओर चला गया।


इसके अनन्तर उज्वल परिधान पहने वृद्धों का समूह आया। उसने भी वैसा ही किया। इसके बाद चार सौ पण्डित आये। उन्होंने भी मण्डप की प्रदक्षिणा की और कुछ बोलकर चले गये। इसके अनन्तर दो सौ रूपवती युवतियाँ मणि-मुक्ताओं से भरे थाल लिये आयीं और वे भी प्रदक्षिणा कर कुछ बोल कर चली गयीं। इसके बाद मुख्यमन्त्री के साथ सम्राट् ने प्रवेश किया और वे भी उसी प्रकार वापस चले गये।


जौहरी चकित था। वह कुछ भी नहीं समझ पा रहा था कि यह क्या हो रहा है। उसने अपने मित्र मन्त्री से पूछा। मन्त्री ने बताया- सम्राट् के धन-वैभव की सीमा नहीं। किंतु उनके एक ही पुत्र था। भरी जवानी में चल बसा यहाँ उसकी कब्र है। प्रति वर्ष सम्राट् अपने सैनिकों तथा पारिवारिक व्यक्तियों के साथ बालक के मृत्यु - दिवस पर आते हैं और जो कुछ करते हैं, वह तुमने देखा ही है। सैनिकों ने कहा था- 'हे राजकुमार! भूतलपर कोई भी अमित शक्ति होती तो उसका ध्वंसकर हम तुम्हें निश्चय ही अपने पास ले आते, पर मृत्यु पर अपना कोई वश नहीं। हम सर्वथा विवश थे,

इसी कारण तुम्हारी रक्षा नहीं कर सके।' वृद्ध समुदाय ने कहा था- 'वत्स! यदि हमारी आशीष में इतनी शक्ति होती तो इस प्रकार धरती में तुम्हें सोते हम नहीं देख सकते, पर कराल काल के सम्मुख हमारी आशीष की एक नहीं चल पाती।'

पण्डितों ने दुखी मन से कहा- 'राजकुमार! ज्ञान विज्ञान अथवा पाण्डित्य से तुम्हारा जीवन सुरक्षित रह पाता तो हम तुम्हें जाने नहीं देते, पर मृत्यु पर हमारा कोई वश नहीं।'


सौन्दर्य - पुत्तलिकाओं ने दुखी होकर कहा था 'अन्नदाता ! धन-सम्पत्ति अथवा रूप-लावण्य यौवन से हम तुम्हारी रक्षा कर सकतीं तो अपनी बलि दे देतीं, पर जीवन मरण की नियामिका शक्ति में अपना कोई वश नहीं। वहाँ धन-सम्पत्ति, रूप-लावण्य-यौवन का कोई मूल्य नहीं।'


अन्त में सम्राट्ने कहा था- 'प्राणप्रिय पुत्र! अमित बल- सम्पन्न सैनिक, तपोनिधि वयोवृद्ध- समुदाय, ज्ञान विज्ञान-सम्पन्न विद्वत् समुदाय और रूप-लावण्य यौवन सम्पन्न कोमलांगियाँ- जगत्‌ की सभी वस्तु तो मैं यहाँ ले आया, किंतु जो कुछ हो गया है, उसे मिटाने की सामर्थ्य तेरे इस पिता में ही नहीं, विश्वकी सम्पूर्ण शक्ति में भी नहीं है। वह शक्ति अद्भुत है।'


मन्त्री की इन बातों को सुनकर जौहरी का हृदय अशान्त हो गया। संसार उन्हें जैसे काटने दौड़ रहा था। व्यवसाय आदि का सारा काम छोड़कर वे बसरा भागे और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक मेरे काम क्रोधादि विकार सर्वथा नहीं मिट जायेंगे, तब तक मैं जगत्‌ के किसी कार्य में सम्मिलित नहीं होऊँगा न कभी हँसूँगा और न मौज-शौक कर सकूँगा।' उसी समय से वे प्रभु-स्मरण में लग गये।

〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

Sandeep Sharma Sandeepddn71@gmail.com Sanatansadvichaar.blogspot.com

सिमटते दायरे on Facebook 

 Jai shree Krishna g 

Comments

Popular posts from this blog

धर्म क्या है? इसका महत्व क्या है।

 उतर:- आजकल  धर्म को लोग  बड़े विचित्र  रूप से देखने लगे हैं।हर किसी ने अपनी सुविधानुसार व बुद्धि अनुसार इसकी अपनी ही व्याख्या गढ़ ली है।जो कि वास्तविक आधार लिए नहीं है। आमतौर पर अपनी आस्था की पद्धति या उसके विभिन्न पहलुओं की व्याख्या करने वाले विद्वान् भी इस सरल से अभ्यास को जटिल ही बनाए जा रहे हैं। यहां आज यह एक अभिव्यक्ति का सशक्त व  संवेदनशील मुद्दा बनाया जा रहा है वहीं यह अपनी वास्तविक आधार खोता जा रहा है। (क्यूंकि इस में काल के अनुसार नवीनता की बहुत गुंजाइश है।)मैं किसी को व्यक्तिगत रूप से दोषी नहीं मानता क्योंकि हर किसी को अपना पक्ष रखने की स्वतंत्रता है वहीं अपनी जानकारी व विवेक के आधार पर अपनी राय रखने का भी अधिकार है। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि धर्म मात्र आस्था विश्वास की अपनाई जाने वाली कोई  पद्धति मात्र नहीं बल्कि विशुद्ध  रूप से न्यायसंगत कर्मों की न्यायिक  व्यवस्था है। अगर मैं इसे  किसी अन्य  रूप से कहूं तो हमारी श्रृद्धा व इमानदारी से किया गया आचरण जो शत-प्रतिशत हमारे कर्त्तव्यों को न्यायपूर्ण ढंग से व जो काल, स्थान...

भौतिक शरीर क्या है? इसका क्या महत्व है!

शरीर के बारे में श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि ये ज्ञान क्षेत्र व श्रेत्रज्ञ का है। यहां क्षेत्र को शरीर कहा है वह इसके जानकार को क्षेत्रज्ञ। अतः पांच भौतिक तत्वों अग्नि,वायु जल,आकाश (जिसे अंतरिक्ष भी कहते हैं) ,व भूमि, से निर्मित ये परिकृषत  स्वचालित व जटिल उपकरण जो आपको मिला है इसके पीछे एक गूढ़ उद्देश्य है।यह मात्र दो अणुओं (अंडाणु व शुक्राणु) के मेल से आरंभ होकर एक उत्कृष्ट यंत्र में विकसित होता है ताकि आपके होने की सार्थकता परिपूर्ण हो।ये इन्हीं पंच  तत्वों से मिलकर बनता है, इन्हीं तत्वों से पोषित होता है वह इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है यह आपके सत्ताशील होने की निशानी है आपके चैतन्य होने का प्रमाण है। और यह तभी सम्भव है जब इसकेे पीछे एक असीम आनन्द का कारण हो। वास्तव में यह जीव का निवास स्थान है यहां से जीवन की समस्त गतिविधियों को पूरा करने का प्रयास जीव करता है। आपके चैतन्य आत्मा जब किसी इच्छा को पूर्ण करने की कामना करता है तो उसे पूरा करने हेतु जो पहली आवश्यकता होती है वो शरीर ही है। यही जीव या प्राणी मात्र के कारण कार्यों को पूरा करने का उपकरण...

भारत की धरोहर अद्भुत कवि की विचित्र रचना

  आज दोस्तों आप के सामने एक अनुठे  व महान कवि व रचनाकार की अद्भुत क्षमता की प्रस्तुति लाया हूं जो न केवल श्रेष्ठतम है बल्कि विशुद्ध व अद्वितिय है।आइए अवलोकन करें उस महान अनुकृति का और गौरव करें भारतीय संस्कृति का व उसके महान रचनाकारों का। *अति दुर्लभ एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म में* इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए --- *यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ*🌺 क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण कथा के रूप में होती है । जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शि...