Skip to main content

बाहरी दुनिया ।

 

दिखती है कितनी निखरी,
कितनी संवरी,
बाहरी दुनिया,
जबकि अंदर शोर बहुत  है ,
सुन्दर  भले है यह बाहरी दुनियां।

अंदर कर रहा  किलोले,
भीतर का अशांत अन्तर्मन,
पर दिखा रहा बाहर से ,
उज्वल, सब है, लेकिन भीतर सूनापन।

है न अविश्वसनीय पर सच्ची है ,
यह स्थिति  जो छिपती दिखती ,है।
छिपा कर  कितने अंतरद्वंद,
भीतर गहरे घाव छिपाए
हॅस रहा है कैसे अंतर्मन।

पानी है जो बाहरी खुशियां,भीतर का मन करो ,

उज्जवल ध्वल ,

देकर खुशिया, पाओ खुशिया,

ताकि हो नयन सजल।

खुद  को खुद ही रखो  पवित्र,
रखो अपना ऊंचा  चरित्र,

कहना मुझे जो फिर न संवरे,
मन की सब तुम्हारी  खुशियां,
रंगीन  होगी  सब की सब ,
बाहर भीतर की तुम्हारी दुनियां।
           ।¤¤¤¤¤¤¤।
जय श्रीकृष्ण मित्रगण।
संदीप शर्मा।( देहरादून से।)


Comments

Popular posts from this blog

बेचारे शर्मा जी।

इक लघु कथा। अब आप जरा शर्मा  जी का कसूर  बताएगे,कि वो बेचारे किस वजह श्रीमति जी द्वारा पीटे गए, जबकि  वो तो उन्ही की आज्ञापालन कर रहे थे। दरअसल हुआ  यूं कि पत्नी जी ने सुबह दस बजे cooker मे दाल चढाई  ओर हिदायत  दी कि वो बाजार जा रही है तो सीटी व दाल का ध्यान  रखना तीन बज जाए  तो गैस बंद  कर देना।यह कह पत्नि  जी तो निकल पडा पर इधर बेचारे शर्मा जी।इंतजार मे ओर गजब देखे ,कि तीन बजे तो दूर बारह बजे  से पहले ही कूकर ने सीटी देना तक बंद कर दिया सो शर्मा  जी ने भी गैस बंद  कर दी। जबकि सीटियां तो मात्र 159 ही बजी थी।उसके बाद  तो टैं भी न बोली।तो उन्होने  थक हारकर  तीन  से बहुत  पहले ही गैस बंद  कर दी पर जब पत्नी  जी लौटी किचन मे गई, और आकर बेचारे  शर्मा  जी को पीटा ,जो पीटा कि ,कि उन्हे पूछने लायक भी न छोडा कि गलती कहा हुई। न,न,  भई, मुझसे भी मत पूछना । मै भी शर्मा  ही हूं। हिम्मत  है तो या तो अपनी खोपड़ी, घुमाओ  अन्यथा, पत्नि  जी से पूछो ।अरे ,भई  कहा चले ...

सिमरन क्या, क्यू व कब ?

 जय श्रीकृष्ण।  सभी मित्रगण  सुधिजन  ,पाठकगण, व,आदरणीय  जन को राधे राधे  के स्नेहिल  अभिनंदन के बाद मीठी सी जय श्रीकृष्ण।  साथियो  अक्सर कहते सुना है भज ले हरि का नाम तू बंदे फिर  पाछे पछताएगा। या गुरू धारण  कर लिया तो आवश्यक  है सुमिरन।  सुमिरन  है क्या ? क्यू आवश्यक  है लाभ  हानि  सब की चर्चा करेगे यहा। तो आइए पहले जाने कि :- *सुमिरन  है क्या ? सुमिरन  अर्थात  सिमरन। यानि पुनः पुनः किसी मंत्र   या नाम  का दोहराव  या उच्चारण करना।। पुनः पुनः ,बार बार। आखिर  बार बार क्यू? तो कारण स्पष्ट है मन की गति  तीव्र  है ,चलायमान है,चंचल  है मन,अस्थिर  है वायु की भांति  टिकता नही शायद वायु के गुण  लिए  है सो  इस अस्थिर व चंचल मन को स्थिरता देने के लिए  अभ्यास  की आवश्यकता है यह अभ्यास  सिमरन  कर पूरा  किया जा सकता है।एक कारण यह है । दूसरे और भी कई  महत्वपूर्ण  कारण है।मसलन अपना उद्धार। हम अपने मन को न...

कशमकश

  कशमकश मे हू मै,, दिल की सुनवाई से,,। कहता है जो  वो ,,वो कर नही पाता ,, जो करता हू वो,,  बेचारा सह नही पाता,, होकर अनमना सा ,, नाराज  रहता है संग मेरे,, जैसे लिए  हो इक लड़की ने ,, बिन मन मेरे  संग फेरे,, यह कहू तो सच है ,, सिर्फ काव्य नही है,, हकीकत  भी बनती है ,,फिर,, कविता क्यू ,, ये ,,स्वीकार्य  नही है ? मै तो लिखूगा,,यह सच ,, मुझे जो  लगता है सही है ,, कविता का,, फाइनल  सा टच,, इसमे कोई बनावट तो नही है,,। जो सीधे जज्बात,,बोलती है ,, कविता फिर  जिंदा हो उठती है,, तब रूह की ,, आवाज  बोलती है। तो लोग नाहक ही डरते है ,,न,, नादान  है बहुत,, उसकी ही है वो बात ,, जो बदल कर  नाम बोलती है। पढने वाले,, पढते नही है कविता,, वो दिल के हालात  पढ लेते है,, तभी तो ,,फिल्म मे चलने वाला संगीत,, सिर्फ  महबूब ही  फिर क्यू समझते  है। यह कशमकश,,क्या आप  ,कुछ  समझे ? कि बिन मन ,,संग कैसे ,, वो मेरे हॅस दे। ...