Skip to main content

जिज्ञासा ।

 

है इक कौतुक  हर ह्रदय मे,
और साथ  है भरपूर सी आशा,
कर लू यह भी ,कर लू वह भी ,
पाने कि सुख है अभिलाषा।
कितना कुछ  करने को है,
कितनी भीतर है जिज्ञासा,
कितने काम पिपासु  है हम ,
तय करती सफलता व आशा,
जैसी वृति व जैसा आचरण
दिलवाती हमे सफलता या निराशा।
बनो जिज्ञासू,काम पिपासु ,
यही मंत्र  है हमारी सफलता का।
क्षेत्र  चाहे वैज्ञानिक हो आर्थिक,
  या फिर हो आध्यात्मिक,
जितना ज्ञान  बटोर लोगे,
उतनी  अच्छी होगी  हर आशा।
जानने को  रहो सदा ही आतुर,
और मिटाओ आपनी जिज्ञासा।
बस थोडा सा बच के रहना,
न करना तांकझांक, अन्यो  की निजता का,
सफल सफर  मे  तो हो जाओगे,
पर मान न मिलेगा,पाओगे निराशा।
सफलता का मूल यही है ,
कि हो मन मे एक जिज्ञासा।
और बताऊ  इक बात खास,
हम  बने कयू हम, क्योकि थी जिज्ञासा।
############
संदीप शर्मा।देहरादून से।

Comments

Popular posts from this blog

भौतिक शरीर क्या है? इसका क्या महत्व है!

शरीर के बारे में श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि ये ज्ञान क्षेत्र व श्रेत्रज्ञ का है। यहां क्षेत्र को शरीर कहा है वह इसके जानकार को क्षेत्रज्ञ। अतः पांच भौतिक तत्वों अग्नि,वायु जल,आकाश (जिसे अंतरिक्ष भी कहते हैं) ,व भूमि, से निर्मित ये परिकृषत  स्वचालित व जटिल उपकरण जो आपको मिला है इसके पीछे एक गूढ़ उद्देश्य है।यह मात्र दो अणुओं (अंडाणु व शुक्राणु) के मेल से आरंभ होकर एक उत्कृष्ट यंत्र में विकसित होता है ताकि आपके होने की सार्थकता परिपूर्ण हो।ये इन्हीं पंच  तत्वों से मिलकर बनता है, इन्हीं तत्वों से पोषित होता है वह इन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है यह आपके सत्ताशील होने की निशानी है आपके चैतन्य होने का प्रमाण है। और यह तभी सम्भव है जब इसकेे पीछे एक असीम आनन्द का कारण हो। वास्तव में यह जीव का निवास स्थान है यहां से जीवन की समस्त गतिविधियों को पूरा करने का प्रयास जीव करता है। आपके चैतन्य आत्मा जब किसी इच्छा को पूर्ण करने की कामना करता है तो उसे पूरा करने हेतु जो पहली आवश्यकता होती है वो शरीर ही है। यही जीव या प्राणी मात्र के कारण कार्यों को पूरा करने का उपकरण...

सिमरन क्या, क्यू व कब ?

 जय श्रीकृष्ण।  सभी मित्रगण  सुधिजन  ,पाठकगण, व,आदरणीय  जन को राधे राधे  के स्नेहिल  अभिनंदन के बाद मीठी सी जय श्रीकृष्ण।  साथियो  अक्सर कहते सुना है भज ले हरि का नाम तू बंदे फिर  पाछे पछताएगा। या गुरू धारण  कर लिया तो आवश्यक  है सुमिरन।  सुमिरन  है क्या ? क्यू आवश्यक  है लाभ  हानि  सब की चर्चा करेगे यहा। तो आइए पहले जाने कि :- *सुमिरन  है क्या ? सुमिरन  अर्थात  सिमरन। यानि पुनः पुनः किसी मंत्र   या नाम  का दोहराव  या उच्चारण करना।। पुनः पुनः ,बार बार। आखिर  बार बार क्यू? तो कारण स्पष्ट है मन की गति  तीव्र  है ,चलायमान है,चंचल  है मन,अस्थिर  है वायु की भांति  टिकता नही शायद वायु के गुण  लिए  है सो  इस अस्थिर व चंचल मन को स्थिरता देने के लिए  अभ्यास  की आवश्यकता है यह अभ्यास  सिमरन  कर पूरा  किया जा सकता है।एक कारण यह है । दूसरे और भी कई  महत्वपूर्ण  कारण है।मसलन अपना उद्धार। हम अपने मन को न...

बेचारे शर्मा जी।

इक लघु कथा। अब आप जरा शर्मा  जी का कसूर  बताएगे,कि वो बेचारे किस वजह श्रीमति जी द्वारा पीटे गए, जबकि  वो तो उन्ही की आज्ञापालन कर रहे थे। दरअसल हुआ  यूं कि पत्नी जी ने सुबह दस बजे cooker मे दाल चढाई  ओर हिदायत  दी कि वो बाजार जा रही है तो सीटी व दाल का ध्यान  रखना तीन बज जाए  तो गैस बंद  कर देना।यह कह पत्नि  जी तो निकल पडा पर इधर बेचारे शर्मा जी।इंतजार मे ओर गजब देखे ,कि तीन बजे तो दूर बारह बजे  से पहले ही कूकर ने सीटी देना तक बंद कर दिया सो शर्मा  जी ने भी गैस बंद  कर दी। जबकि सीटियां तो मात्र 159 ही बजी थी।उसके बाद  तो टैं भी न बोली।तो उन्होने  थक हारकर  तीन  से बहुत  पहले ही गैस बंद  कर दी पर जब पत्नी  जी लौटी किचन मे गई, और आकर बेचारे  शर्मा  जी को पीटा ,जो पीटा कि ,कि उन्हे पूछने लायक भी न छोडा कि गलती कहा हुई। न,न,  भई, मुझसे भी मत पूछना । मै भी शर्मा  ही हूं। हिम्मत  है तो या तो अपनी खोपड़ी, घुमाओ  अन्यथा, पत्नि  जी से पूछो ।अरे ,भई  कहा चले ...